कमाल हो गया दोस्तों। एक करोड़ से ज्यादा लोग बाढ से प्रभावित हैं पर हमारी मीडिया को कोई चिंता नहीं। सी एन एन और बी बी सी पर ताबड़ तोड़ रिपोर्टिंग जारी है, कहते हैं संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे पिछले कुछ दशकों का सबसे ज्यादा भयंकर बाढ बताया है। पर अपना कोई देसी चैनेल को देखिए, चलते फिरते में इस खबर को निपटा देते हैं। हाँ नेतागण अपने उड़न खटोले पर घूम रहे हैं, मर्जी आती है तो मजबूती जाँचने के लिए सड़क पर ही उतार लेते है। भई साईट इंसपेकसनवा जो जरूरी रहल। का कहल जाइ, हालत खराब बा।घाघरो जो घूम्यो।
गंगा, सोन, गंडक, सब उफनते आ रहीं हैं। दिक्कत की बात ये है कि नेतागण का क्या कहें, बहते पानी में भी राजनीति जारी है।ऐसे समय में माननीय नीतिश जी का मौरिशस दौरा दो देशों के बीच भाईचारा बढाने के लिए जरुरी था।जब १०० करोड़ के देस की बात आती है तो एक आध करोड़ की तकलीफ कहाँ बीच मे ला रे हो भाई। बड़ा मुसकिल है भाई, पिस गया बिहारी, एक तरफ चारा, दूसरी तरफ भाईचारा। घाघरो जो घूम्यो।
दरभंगा शहर की हालत खराब है। समस्तीपुर के पुराना पुल के उपर से पानी बह रहा है। पटना के कंकडबाग मुहल्ले की हालत वहीं के लोग समझ सकते है। पर चिन्ता की कोनो बात नहीं। दो तीन हेलीकाप्टर खाने के लिए चने के पैकेट गिरा रहे हैं।एक करोड़ लोगों के लिए। घाघरो जो घूम्यो।
सोचिए उन लोगों का जो अपने रिश्तेदारों से कई दिनों तक चाहने के बावजूद भी फोन पर नहीं बात कर सकते है। फोन खराब है। कहते हैं जब नेपाल से पानी बहकर आता है तो कई जिलों मे तबाही मच जाती है। पर नेपाल तो मित्र देस है। कैसे हम उन्हे अपनी तकलीफ समझाएँ। उन्हे बुरा लग गया तो दोस्त नाराज हो जाएगा। घाघरो जो घूम्यो।
पिलानिंग? कौचि का पिलानिंग? बाँध बनाके का होगा? पानी पर स्टियरिंग व्हील तो नहीं है जो कहीं भी मोड़ दिया। और का इंद्र भगवान किसी के मौसा लगते हैं का? भगवान है, दू लोटा पानी जादा बरस गया तो काहे बिलबिला रहा है भाई? घाघरो जो घूम्यो।
मंगलवार, अगस्त 07, 2007
मंगलवार, जुलाई 24, 2007
कलाम साहब, सलाम
कलाम साहब आज से भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति कहलाएँगे। राजदीप सरदेसाई ने अपने चिट्ठे पर हाल के एक समारोह के बारे मे लिखा है कि किस प्रकार कलाम साहब ने पत्रकारों की भी क्लास ली, और नाराज होने कि बजाए, उन्हे भी आनन्द आया।यहाँ चेन्नई में सुगबुगाहट और उत्साह के मिश्रण का माहौल है। अन्ना विश्वविद्यालय में, जो तमिल नाडु का प्रमुख तकनीकी शिक्षा केन्द्र है, में अपेक्षा का माहौल है। कहते हैं कलाम साहब यहाँ अपने पठन-पाठन को जारी रखेंगे। बिहार से खबर ये आई थी कि नितीश बाबु कलाम साहब को पुर्नजागृत नालन्दा विश्वविद्यालय के विसिटर बनने के लिए आग्रह कर रहे हैं। मेरे लिए दोनो बड़ी खुशी की स्थिति है, क्योंकि मैं अन्ना विश्वविद्यालय के सड़क पार भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के प्रांगण मे रहता हूँ और मेरा पैतृक स्थान नालंदा है।
लो, कलाम साहब का नया जालस्थल भी तैयार हो रहा है। ये कल से चालु हो जाएगा। कमाल की बात ये है कि अभी इस जालस्थल पर कोई सामग्री तो नहीं पर फिर भी पेजरैक ४ है (पेज रैंक कैसे देखें)। शायद भारत के इस महान नायक को गूगलदेव भी सलाम कर रहे हैं। जी हाँ, कलाम साहब अब राष्ट्रपति भले ना कहलाएँ, पर नायक तो वे हैं ही।
( व्यंग्य पढें - राष्ट्रपति कलाम और मुशर्रफ के बीच एक काल्पनिक शिखर वार्ता)
लो, कलाम साहब का नया जालस्थल भी तैयार हो रहा है। ये कल से चालु हो जाएगा। कमाल की बात ये है कि अभी इस जालस्थल पर कोई सामग्री तो नहीं पर फिर भी पेजरैक ४ है (पेज रैंक कैसे देखें)। शायद भारत के इस महान नायक को गूगलदेव भी सलाम कर रहे हैं। जी हाँ, कलाम साहब अब राष्ट्रपति भले ना कहलाएँ, पर नायक तो वे हैं ही।
( व्यंग्य पढें - राष्ट्रपति कलाम और मुशर्रफ के बीच एक काल्पनिक शिखर वार्ता)
मंगलवार, जुलाई 17, 2007
मेरी हिन्दी चिट्ठा यात्रा का एक वर्ष
गत वर्ष लगभग आज के ही दिन मैने उत्सुकतावश ढूंढने हिन्दी टंकन के तरीके ढूंढने की कोशिश की थी। हमे रमण कौल जी के युनिनागरी ने प्रभावित किया और मैने २१ जुलाई को डरते-डरते एक लाइन का पोस्ट लिखा। डर लगे भी तो ना क्यों - उन्नीस वर्ष बाद जो हिन्दी में लिखकर अभिव्यक्त करना आसान नहीं है।
खैर जैसे ही लिखा, कुछ उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ भी नामालूम कहाँ से आ गई। फिर एक और पोस्ट लिखा, जो कुछ लाइनो का था। फिर नारद जी से मुलाकात हुई। बात अच्छी लगी और हमने डरते-डरते अपने चिट्ठे को शामिल करने का आवेदन डाला।
मैं ये सोचता था कि मेरे लिए हिन्दी मे लिखना काफी मुशकिल रहेगा क्योंकि मैं भारत के एक अहिन्दी भाषी प्रदेश में रहता हूँ, जहाँ हिन्दी के समाचारपत्र तो क्या, दुकानों के बोर्ड भी नहीं दिखाई पड़ते है। फिर आखें खुली और मालूम चला कि कई लोग तो अपने बेहतरीन हिन्दी चिट्ठे भारत के बाहर से लिख रहे हैं।
फिर वर्तनी कि चिंता सताने लगी कि साहब अगर गलत हिज्जे लिखे तो क्या सोचेगी जनता। फिर शब्दकोष से मुलाकात हुई तो तो काफी समस्याओं का निवारण हुआ।
तबतक हमें हिन्दी चिट्ठाजगत से परिचय हो चुका था। समझ में ये आया कि वैसे तो सभी त्रुटिहीन पोस्ट पढ़ना चाहते हैं पर यदि एक-आध त्रुटि रह भी जाए तो कोई परेशानी वाली बात नहीं है। और फिर हमे अंग्रेजी चिट्ठों पर भी व्याकरण और हिज्जे की धज्जियाँ उड़ती दिखाई देने लगे और हमने समझ लिया कि भई ठीक है।
जब हम चेन्नई ब्लागकैंप मे गए और वहाँ पर भारतीय भाषाऔं मे ब्लागिंग पर बातचीत हुई तो हमने अपने-आप को हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में, कुछ पल के लिए ही सही बोलता हुआ पाया। जी हाँ मैं वही हूँ जिसने दसवीं की परीक्षा के बाद हिन्दी पढने-लिखने से दूर रहने की ठानी थी !
आज हिन्दी में दनादन चिट्ठे लिखे जा रहे हैं। ज्यादातर सामयिक और सामाजिक विषयों पर लिखे जाते हैं।एक आध तकनीकि विषयों पर, कुछेक व्यापारिक विषयों पर भी उभर रहें हैं। कविताएँ भी पढने को मिल जाती है यानि स्थिति काफी मजेदार है।हिन्दी चिट्ठों के माध्यम से मैने देखी है एक बिलकुल अलग दुनियाँ। धन्यवाद बंधुओं। साफ है कि बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।छोटे में आज इतना ही।

खैर जैसे ही लिखा, कुछ उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ भी नामालूम कहाँ से आ गई। फिर एक और पोस्ट लिखा, जो कुछ लाइनो का था। फिर नारद जी से मुलाकात हुई। बात अच्छी लगी और हमने डरते-डरते अपने चिट्ठे को शामिल करने का आवेदन डाला।
मैं ये सोचता था कि मेरे लिए हिन्दी मे लिखना काफी मुशकिल रहेगा क्योंकि मैं भारत के एक अहिन्दी भाषी प्रदेश में रहता हूँ, जहाँ हिन्दी के समाचारपत्र तो क्या, दुकानों के बोर्ड भी नहीं दिखाई पड़ते है। फिर आखें खुली और मालूम चला कि कई लोग तो अपने बेहतरीन हिन्दी चिट्ठे भारत के बाहर से लिख रहे हैं।
फिर वर्तनी कि चिंता सताने लगी कि साहब अगर गलत हिज्जे लिखे तो क्या सोचेगी जनता। फिर शब्दकोष से मुलाकात हुई तो तो काफी समस्याओं का निवारण हुआ।
तबतक हमें हिन्दी चिट्ठाजगत से परिचय हो चुका था। समझ में ये आया कि वैसे तो सभी त्रुटिहीन पोस्ट पढ़ना चाहते हैं पर यदि एक-आध त्रुटि रह भी जाए तो कोई परेशानी वाली बात नहीं है। और फिर हमे अंग्रेजी चिट्ठों पर भी व्याकरण और हिज्जे की धज्जियाँ उड़ती दिखाई देने लगे और हमने समझ लिया कि भई ठीक है।
जब हम चेन्नई ब्लागकैंप मे गए और वहाँ पर भारतीय भाषाऔं मे ब्लागिंग पर बातचीत हुई तो हमने अपने-आप को हिन्दी चिट्ठाकारी के बारे में, कुछ पल के लिए ही सही बोलता हुआ पाया। जी हाँ मैं वही हूँ जिसने दसवीं की परीक्षा के बाद हिन्दी पढने-लिखने से दूर रहने की ठानी थी !
आज हिन्दी में दनादन चिट्ठे लिखे जा रहे हैं। ज्यादातर सामयिक और सामाजिक विषयों पर लिखे जाते हैं।एक आध तकनीकि विषयों पर, कुछेक व्यापारिक विषयों पर भी उभर रहें हैं। कविताएँ भी पढने को मिल जाती है यानि स्थिति काफी मजेदार है।हिन्दी चिट्ठों के माध्यम से मैने देखी है एक बिलकुल अलग दुनियाँ। धन्यवाद बंधुओं। साफ है कि बात निकली है तो दूर तलक जाएगी।छोटे में आज इतना ही।
मंगलवार, जून 12, 2007
टिप्पणियों के संकलन को ब्लागर पर दर्शाना
साथी ब्लागर उनमुक्त जी ने पूछा है कि ब्लागर में किस तरीके से पाठकों की टिप्पणियों के संकलन को चिट्ठे पर दिखाया जा सकता है (मिसाल के लिए दाहिने देखिए- प्रतिक्रियाएँ)। वास्तव में बड़ा ही आसान तरीका है।दरअसल आपके चिट्ठे की पोस्टों की तरह ही पाठकों की टिप्पणियों का भी एक फीड होता है। आप टेम्पलेट में जाकर एक नया पेज एलिमेंट डालें जो कि फीड के लिए हो। फिर फीड का स्रोत ये बताएँ - http://abcxyz.blogspot.com/feeds/comments/default । सेव कर दें। बात खत्म। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये कुछ घंटो के अंतराल पर ही पुर्नप्रकाशित होती है।
ले बलइया - सटाक
अब जब देसभर के क्रिकेट प्रेमी ये सोच ही रहे थे कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड का क्या किया जाए तो जोर की आवाज आई सटाक। मालूम चला ये चाँटा ग्राहम फोर्ड साहब ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के गाल पर रसीद किया है। जोर का झटका धीरे से लगे। नहीं नहीं धीरे का झटका बड़े जोर से लगे, आह। लो फिर गूंज उठी - सटाक।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)