शुक्रवार, अगस्त 18, 2006

उत्कृष्ट - ब्लू ओशन स्ट्रैटेजी

पुस्तक का मुख्य पृष्ठ
आखिरकार अमरीकी बुद्धिजीवियों को युरोपीय बुद्धिजीवियों से टक्कर मिल रही है। मुआब्रान्य् और चान किम की पुस्तक ब्लू ओशन स्ट्रैटेजी या हिन्दी में कहें तो नीला सागर रणनीति कुछ ऐसा ही प्रयास है। दोनो लेखक युरोप के विशिष्ट माने जाने वाले प्रबंध संस्थान इनसीद में नामी शिक्षक हैं। पुस्तक कितनी प्रचलित है यह इससे अनुमान लगाएं कि इसकी ३२ भाषाओं दस लाख से ज्यादा प्रतियाँ बिक चुकी है और पुस्तक सामरिक व्यापारिक सोच में अपना स्थान बना चुकी है।यदि इसकी प्रथम खासियत कहें तो लेखकों ने दुसरे विचारकों कि तरफ शुतुर मुर्गीय रवैया रखने कि बजाय उनके विचारों को भी उद्धृत किया है।जिम कॉलिन्स के बहुचर्चित शीर्षको को काफी आदर दिया गया है (हाँलाकि आलोचना भी छोड़ी नहीं)।

पुस्तक सामरिक पटल के संकल्पना के इर्द-गिर्द घूमती है। नीला सागर यानी एसा खाली स्थान जहाँ कोसों तक आपका ही वर्चस्व हो। कहते हैं कि प्रबंध की पुस्तकों की प्रवृति होती है कि वे नामी और सफल उद्धमों के इतिहास का वर्णन मात्र होती है। पढ़कर निचोड़ निकालें तो शायद अच्छी भावना के अलावा कुछ कहीं रहता़! पर इस पुस्तक में सामरिक विश्लेषण के औजार है।इस उत्कृष्ट पुस्तक में व्यक्त किया गया है कि उद्योग जगत में सफलता के लिए हर उद्धम को एक ऐसा नीला सागर तलाशना होता है जहाँ उसका कोई सानी ना हो। यानी, अपनी संगठन की मजबूती के अनुसार अपना बाजार अनुभाग तलाशना होगा। सबसे अहम यह है कि प्रतियोगियों के भी मजबूती को उसी सामरिक पटल पर तोलना होगा। किन्तु केवल वर्णन ही नहीं पर उसके लिए औजार भी है। महत्वपूर्ण ये है कि आम पुस्तकों कि तरह यह किताब केवल पीछे की ओर नहीं देखती पर आपको भविष्य के लिए सोचने का एक नज़रिया भी देती है। यह एक भारी फर्क है।

दूसरा, अमरीकी लेखको की प्रवृति होती है कि जहाँ उदाहरण भी देने हो, वे अमरीका के ही हो। पर सफल उद्धम तो दुनियाँ भर मे पाए जाते हैं और मुआब्रान्य् और चान किम की इस तरह के क्षेत्रीय बंधन से बंधे नहीं दिखते।

तीसरा, इस पुस्तक मे भारी भरकम शब्दों का प्रयोग भी कम ही है।

क्या पुस्तक प्रतिस्पर्धा को अप्रासंगिक बनाने के बारे मे है? या होड़ में आगे लिकलने के बारे में? अथवा पोजिशनिंग के बारे में। या फिर आपके उद्धम को व्याख्या करने के बारे में? वास्तव में नीला सागर रणनीति सभी सामरिक तत्वों का समिश्रण है जो उद्योग प्रतिस्पर्धा में इस्तेमाल होते हैं। छोटे में कहा जाए तो 'आगे कैसे बढ़े'। पर ध्यान रहे, इसे पढ़ते समय आपको एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी के नजरिए से सोचना होगा।किताब भारतीय मानको से थोड़ी महंगी है। पर यह आप बार बार पढ़ेगे यह यकीन करें। हमने एक उत्कृष्ट पुस्तक की बात की है।(चलते चलतेः उन ३२ भाषाओं मे एक भी भारतीय भाषा नहीं है, यह दुख की बात है।)
--------------------------------------------------------------------------
शब्दकोष.कॉम तथा युनिनागरी टंकन पटल की मदद से।
Test

5 टिप्‍पणियां:

Sagar Chand Nahar ने कहा…

इतना उत्कृष्ट विश्लेषण!!!!
भैया कभी कभार किसी हिन्दी पुस्तक के बारे में भी लिख दिया करो,खासकर हम जैसों के लिये जिनके लिये अंग्रेजी काला अक्षर भैंस बराबर होता है।
थोड़ी अच्छी जानकारी हमें भी मिल जाया करेगी।

मुन्ने की मां ने कहा…

यह पोस्ट firefox में नहीं पढ़ी जा पा रही है, फैल रही है। क्या justify की थी। मेरे विचार से left align करें।

उन्मुक्त ने कहा…

यह पोस्ट firefox में नहीं पढ़ी जा पा रही है, फैल रही है। क्या justify की थी। मेरे विचार से left align करें।

अनुनाद सिंह ने कहा…

मैं सागर भाई और उन्मुक्त, दोनो की बातों से यहां असहमत हूँ।

मैं इस पोस्ट को फायरफाक्स पर पढ पा रहा हूँ, यद्यपि बहुत अधिक जूम करने पर कुछ तेक्स्ट दूसरे टेक्स्ट के उपर चढ जा रहा है, किन्तु कम जूम पर यह समस्या नहीं है।

सागर भाई का यह कहना तो ठीक है कि कभी-कभी हिन्दी पुस्तकों की समीक्षा भी कर दिया करें, किन्तु मैं एक अच्छी पुस्तक समीक्षा को बहुत उपयोगी चीज मानता हू.ं।
आज के आपाधापी के युग में सब कुछ पढने का समय किसके पास है। ऐसे में एक सार्थक समीक्षा आपको पुस्तक में वर्णित मुख्य विचारों से अवगत करा देती है। इसके बाद आप इस पुस्तक को न पढने या पढने का निर्णय ले सकते हैं। दोनो ही दशाओं में आपको फायदा पहुँचता है।

अन्त में कहना चाहूँगा कि मुझे यह समीक्षा अच्छी लगी, किन्तु थोड़ा और विस्तार से लिखते तो अच्छा रहता। पुस्तक के कुछ छोटे और महत्वपूर्ण अंश भी उद्धृत करते तो और अच्छा रहता।

अनुनाद सिंह ने कहा…

मैं सागर भाई और उन्मुक्त, दोनो की बातों से यहां असहमत हूँ।

मैं इस पोस्ट को फायरफाक्स पर पढ पा रहा हूँ, यद्यपि बहुत अधिक जूम करने पर कुछ तेक्स्ट दूसरे टेक्स्ट के उपर चढ जा रहा है, किन्तु कम जूम पर यह समस्या नहीं है।

सागर भाई का यह कहना तो ठीक है कि कभी-कभी हिन्दी पुस्तकों की समीक्षा भी कर दिया करें, किन्तु मैं एक अच्छी पुस्तक समीक्षा को बहुत उपयोगी चीज मानता हू.ं।
आज के आपाधापी के युग में सब कुछ पढने का समय किसके पास है। ऐसे में एक सार्थक समीक्षा आपको पुस्तक में वर्णित मुख्य विचारों से अवगत करा देती है। इसके बाद आप इस पुस्तक को न पढने या पढने का निर्णय ले सकते हैं। दोनो ही दशाओं में आपको फायदा पहुँचता है।

अन्त में कहना चाहूँगा कि मुझे यह समीक्षा अच्छी लगी, किन्तु थोड़ा और विस्तार से लिखते तो अच्छा रहता। पुस्तक के कुछ छोटे और महत्वपूर्ण अंश भी उद्धृत करते तो और अच्छा रहता।