गुरुवार, जुलाई 10, 2008

क्या इस चिट्ठे को दुबारा जीवित कर दिया जाए?

सोचता हूँ चिट्ठे का जीवन कितना उत्तम है- कभी भी जीवित कर लिया जाता है। पर शायद ये बात पूरी सही भी नहीं। अगर सही भी है तो कम-से-कम उचित तो नहीं है। आक्सीजन की जरुरत तो हर कुछ को होती है। चलिए आज से इस चिट्ठे को आक्सीजन की पूर्ति की जाय। मुलाकात को इतने दिन हुए कि चर्चा कहाँ से शुरू की जाए? इतने दिनों मे तो हमने मैसूर घूम आए, सिगरेट पीना छोड़ दिया (इसपर भी चर्चा किसी दिन जल्द ही), केरल भी घूम लिया, अपने अंग्रेजी चिट्ठे को ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस पर खिसका दिया, और पता नहीं कितनो से दोस्ती और कितनों से लड़ाई हुई़!
तो संक्षेप में ये वादा रहा कि लिखता रहूँगा। आज के लिए मैसूर के महाराज का महल की तसवीर, रविवारी रोशनीं में।



( तसवीर हमारे फोन से खींची गई )

रविवार, जनवरी 20, 2008

कुमारकोम की एक यादगार यात्रा।



कुमारकोम दरअसल बैकवाटर पर है, यानि समुद्र के पानी द्वारा बनी काफी बड़ी वेमबानाद झील पर बसा है। यहाँ से आप हाउसबोट पर सवारी कर सकते हैं, और हाउसबोट भी ऐसे कि आप देखते ही रह जाएँ। हमने यहा दो मंजिले हाउसबोट भी देखे, जो किसी सितारा होटल से कम नहीं लगते। यहाँ के हाउसबोट पर सारी सुविधाएँ होती हैं जैसे वातानुकूलित कमरा, कुक आपकी सेवा में शानदार खाना पेश करते हैं, और रात को जब हाउसबोट एक शान्त स्थल पर रुक जाती है, तो कुछ अदभुत ही आनन्द आता है।
मैं बोट की बैठक पर
वैसे यदि समय हो तो एक छोटी बोट पर कुमारकोम शहर के चारो ओर भी विचरण किया जा सकता है। कुछ वेनिस जैसा आभास भी होता है।





कुल मिला के कुमारकोम में काफी आनन्द आया, हमारा अगला पड़ाव था तेकड़ी, जिसकी चर्चा आने वाले पोस्ट में जारी रहेगी। चलते चलके कुमारकोम कि एक और तसवीर।

सोमवार, सितंबर 24, 2007

और धोनी के लड़कों ने धो डाला!

भारत ट्वेंटी ट्वेंटी विश्व कप जीत गया. अगर आपने रोमांच से अपनी उँगलियाँ चबा ली हो तो डॉक्टर से दिखा लें. हो हो हो हो हो हो हो हो!!!!!!!!!!!!!!!!!!

शनिवार, सितंबर 22, 2007

युवराज के छक्के और अंतर्जाल युग

किसने सोचा था की युवि के बल्ले से एक ही ओवर में छे छक्कों की बरसात होगी . मगर ऐसा हुआ. आज से कुछ वर्ष पहले किसने सोचा था की ऐसे अनुभव को जितनी मर्जी चाहो देखो वाली सुविधा आ जायेगी. तो देखिये ऐसे जाडुई क्षणों को, जितनी बार मर्जी हो.स्टुअर्ट ब्रॉड के पसीने निकलते साफ दिखाई दे रहे है. आनंद लें.





गुरुवार, सितंबर 06, 2007

एक रेलयात्रा जो भुलाए नहीं भूलती

१९९८ में मैं और मेरा दोस्त विनीत ऊर्फ भय्यु बक्सा सामान सहित दिल्ली से अपने घर जबलपुर आने वाले थे। हमारी पढाई खत्म हो चुकी थी और हम बड़े उत्साह में थे।दोस्तों से बिछड़ने का दुख भी था।हमें निजामुद्धीन से गाड़ी पकड़नी थी और जैसा कि होता है, हमारे कुछ दोस्त हमे छोड़ने स्टेशन तक आए थे। कहते थे, भेज के ही दम लेंगे।

थोड़ी भीड़ अधिक थी। फिर भी हम अपनी सीट पर पहुँच गए। शाम का समय था। गोंडवाना एक्सप्रेस मात्र दस पाँच मिनट देर से चल पड़ी।

थोडी देर में एक परिवार के लोगों ने हमसे बर्थ बदलने का आग्रह किया।थोड़ा ज्यादा बड़ा दिखने वाला एक खुशकुमा परिवार था। जब हमे पता चला कि उनकी दो बर्थ दूसरे डब्बे में है, तो हमने मना कर दिया। फिर वो हमारे इर्द गिर्द अपनी बर्थों पर बैठ गए। दो बच्चे भी थे। थोड़ी चिल पौं ज्यादा थी। हम थोड़ा परेशान थे। थोड़ी देर में सूर्यास्त हो गया। उन्होंने हमसे फिर आग्रह किया।वो अपना टिकट भी दिखाने लगे। हमनें नकली बड़प्पन दिखाने का नाटक करते हुए टिकट ना देखने की बात कही। फिर भी ही ही करते करते कोने से टिकट पर ट्रेन का नंबर, तारीख और बर्थ नंबर देख ही लिया। हमने सोचा कि शांति मिलेगी, सो बात मान लो।बस निकल लो यहाँ से।

स्थान बदल लिया गया। उनमे से एक सज्जन हमारे साथ नए स्थान तक आए। बड़े भले आदमी दिखे। हम भी ठहरे जबलपुरी, सो एक बक्सा उनसे भी ढुलवा लिया। किसी कारणवश डब्बों के अन्दर से जाने वाला रास्ता बन्द था, सो एक स्टेशन पर ट्रेन के रुकने पर पूरी प्रक्रिया कर ली गई। टी टी वहीं खड़ा था, सो उस भले सज्जन ने उन्हे सूचित भी कर दिया। हवा अच्छी थी, हमने खाना खाया और फिर लंबे हो लिए।पता ही नहीं चला कि कब नींद आ गई।
देर रात कुछ आवाज सुनाई पड़ी। हमने आदत के मुताबिक सबसे पहले ये निश्चित किया कि सारा सामान सुरक्षित है।
दो सज्जन मेरे दोस्त विनीत को बर्थ खाली करने को कह रहे थे। मैं चौड़ा हो गया। पूछा, टिकट है आपके पास। उन्होंने टिकट आगे कर दिया। हमने बत्ती जलाके पूरे टिकट को पढ़ा। कोई त्रुटि नहीं मिली। हमने फिर भी कहा, अभी टी टी से पूछ लेते हैं। टी टी साहब ने उनके टिकट को सही करार दिया। टी टी भी दूसरे दिखे। शायद पिछले टी टी की ड्यूटी खत्म हो चुकी थी और ये नए सज्जन थे। हमने उन्हे माजरा समझाया। फिर बता चला, कि जिन लोगों से हमने बर्थ बदली थी, उनका आरक्षण तो कुछ स्टेशन पहले तक ही था। यानि उन्होंने वहीं तक का टिकट लिया था।
खीस निपोरते हुए हमने दावेदारी वाले नए यात्रियों को दोनो बर्थ थमा दी। उन्होंने हमे बैठने का स्थान भी दिया, पर हम पसर लिए, हम कोई बिना रिजर्वेशन वाले नहीं, हम अपने पुराने बर्थ पर जाके सोने का कार्यक्रम जारी रखेंगे।

हम गेट पर गाड़ी के रुकने का इंतजार करने लगे। काली रात, ठंडी हवा और आधी नींद मे मिला इंसल्ट! फिर एक छोटे से स्टेशन पर गाड़ी रुकी और हम अपने सामान को घसीटते हुए अपने बर्थ वाले डब्बे की तरफ अतितीव्र गति से बढ़ लिए। पहुँच भी गए और गाड़ी के खिसकते खिसकते सामान सहित चढ भी गए।

पर ये क्या! यहाँ तो कोई और लोग सो रहे थे। सो हमने भी उसी ताव से उन्हे उठाया। गलती मानने की बजाय, ये लोग तो हमसे भिड़ लिए। हम ही से ये कहने लगे कि टिकट दिखाइये। हमने कहा आप दिखाइये।बहस होने लगी। तब तक टी टी साब भी आ गए। आते ही हमने पूरी कहानी सुनाई, सोचा समाधान सामने है, बस अभी सोने के लिए बर्थ मिल जाएगी। टी टी साब हम्ही पर पिल पड़े, नो शो था सो हमने पिछले स्टेशन से अलाट कर दिया। ये अब आपकी बर्थ नहीं रही। जिससे शिकायत करनी हो कललो।

अब क्या किया जाता। अगले चंद घंटे हमने अपने बक्से पर बेसिन के पास बैठकर काटे। फिर जबलपुर आया तो मैने और विनीत ने ये किसी को ना बतानी की ठानी। सबको यही बोला यात्रा मजे मे थी, रिजर्वेशन जो करवा रखा था!