शुक्रवार, दिसंबर 15, 2006

वाल-मार्ट भारत में, क्या बदलेगा? -२

अपने पिछले आलेख में मैने वाल-मार्ट के भारती के साथ समझौते के बाद भारत मे आने की बात की है। वास्तव में ये एक छोटा सा भ्रम है।वाल-मार्ट भारत मे स्टोर भले ही ना चला रहा हो, पर वे भारत से काफी कुछ खरीद कर अपने स्टोर में बेचते हैं इस तरह से वो भारत से जुड़े तो पहले से हैं। उनके ग्राहक क्या चाहते है इसपर वे काफी पैनी पकड़ निगाह रखते है। उनके खरीददार भारतीय उत्पाद पर भी निरंतर निगाह रखते हैं, और काफी कम कीमत पर काफी माल उठा लेते हैं। यही है सफल सप्लाई चेन का रहस्य।
हाँ, तो क्या पड़ोस से शर्मा जी की गल्ले की दुकानें बन्द हो जाएंगी और क्या बिल्लु वाल-मार्ट से पेंसिल, कापी खरीदेगा? क्या बिल्लु की माँ वाल-मार्ट से आटा चावल खरीदने जाएगी? लगता तो नहीं, कम से कम तुरंत तो नही और कमसकम पूरे भारत में तो नहीं। कारण कुछ ऐसे हैं।
-वाल-मार्ट के स्टोर जरा बड़े होते हैं। कहाँ है जगह हर मुहल्ले मे?
-शर्मा जी फोन करने पर एक किलो आटे का पैकेट भी लड़के के हाथ भिजवा देते है। बड़ी खराब आदत है जनाब़!
-शर्मा जी उधार पर भी माल सप्लाई कर देते है। वाल-मार्ट से उधार माल खरीदने के लिए क्रेडिट कार्ड की जरुरत पड़ेगी।
- इलेक्ट्रानिक्स - कितनी बार खरीदते है आप?
- कहीं पढ़ा कि भारत मे ७०० शहर हैं। कहाँ कहाँ जाएगी वाल-मार्ट?
- कितनी जल्दी एक तन्दुरुस्त सप्लाई चेन तैयार हो जाएगी।
- एक पैकेट चायपत्ती या नमक के लिए क्या वाल-मार्ट जाया जाएगा? हमारे सौदे जरा छोटे होते हैं जरा।

तो जनाब संभावना कुछ यूँ है। मैकडोनलड्स वालों को देखिए। बड़ी 'उफ-मैकडोनलड्स' थी मीडिया मे उनके आने को लेके। दस साल के बाद भी पाँच छे शहरों से ज्यादा नहीं बढ पाए। वे भारतीय खानपान की आदतों को कितना बदल पाए ये तो मालूम नहीं पर उनके मेनु-कार्ड मे अब भारतीय शब्द जरूर दिखते है।(अच्छा पित्ज़ा बनाते हैं मगऱ!). और अभी भी बहुत कम लोग ही जाते हैं। दूसरा, देसी मॉल भी खुब उभर रहे हैं कुकुरमुत्तों कि तरह, वे भी उसी ग्राहकी को खीचना चाहेंगे(जो गाड़ी मे आए और क्रेडिट कार्ड पार सामान खरीदें)।और तीसरी बात, शर्मा जी को कम मत आँकिए।
हाँ, सेकेंड्री इफेक्टस जरूर होंगे। जैसे भारतीय व्यापार में ग्राहकों को लुभाने के नए तरीके दिखलाई पड़ेंगे। धीरे धीरे वाल-मार्ट जैसी कम्पनियों के सप्लाई चेन, इनवेट्री वगैरह के चलाने के तरीके दूसरों द्वारा सीखे जाएंगे।
यानि ग्राहकों का फायदा। वाल-मार्ट भले सारे शहरों मे न दिखे, पर उसकी मौजुदगी महसूस जरुर की जाएगी। और हाँ, कुछ नौंकरियाँ भी लगेंगी। कुल मिला के मेरा तो यही कहना है, की 'आ जाओ ठाकुर'।
Test

2 टिप्‍पणियां:

शशि सिंह ने कहा…

अच्छा विश्लेषण है. लेकिन एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि ये मॉल वाले सिर्फ माल में इंटरेस्ट रखते हैं लिहाजा उन्होंने इंडिया को अपना लक्ष बनाया. भारत की गलियों में खाक छानने का उनका कोई इरादा नहीं.

अनुनाद सिंह ने कहा…

भारत में आत्मसात करने की बेजोड़ क्षमता है। कोई नया कांसेप्ट लेकर आता है तो अन्ततः हमारा फायदा होता है। कई मामलों में भारत में अभी भी छोटी सोच और कूपमण्डूकता का बोलबाला है। इन सबसे छुटकारा पाने के लिये हमें भारत को विचारपूर्वक 'ग्लोबलाइज' करने का साहस करना चाहिये। कूपमण्दूकता सबसे बड़ा पातक है।